देश में जब भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की सरकार बनी, शिक्षा मंत्रालय अधिकांश समय भारतीय जनता पार्टी के पास ही रहा। इस दौरान मंत्रालय की कमान ऐसे नेताओं को सौंपी गई, जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या व्यापक विचार परिवार से जुड़ा माना जाता है। मुरली मनोहर जोशी से लेकर स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल, धर्मेंद्र प्रधान और अब प्रह्लाद जोशी तक, मंत्रालय का नेतृत्व लगातार बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के हाथों में रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा मंत्रालय केवल स्कूल और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नई पीढ़ी की सोच, शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम और राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण मंत्रालय है। इसी वजह से इसे सरकार की वैचारिक दिशा तय करने वाले सबसे अहम मंत्रालयों में गिना जाता है।हालांकि, विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा है और पाठ्यक्रमों में बदलाव राजनीतिक सोच से प्रभावित रहे हैं। दूसरी ओर बीजेपी का कहना है कि नई शिक्षा नीति, भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षा सुधारों के जरिए छात्रों को वैश्विक स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।हाल के घटनाक्रम में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी ने शिक्षा मंत्री का पद संभाल लिया है। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।
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