फैसले के दौरान अदालत ने मानव तस्करी को मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध बताते हुए कहा कि यह सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। साथ ही कोर्ट ने मामले की जांच में लापरवाही बरतने पर अनुसंधान अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई।
मामला वर्ष 2024 का है। बाल कल्याण समिति के निर्देश पर चाइल्ड लाइन ने पीड़ित नाबालिग को बरामद किया था। बालिका ने बताया था कि उसकी मां और अन्य लोग उसे ओडिशा से राजस्थान के बूंदी लेकर आए थे।
यहां उस पर जबरन शादी करने का दबाव बनाया गया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे अलग-अलग लोगों के पास रखा गया। पीड़िता ने चाइल्ड लाइन को आरोपियों के संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत में 16 गवाहों के बयान दर्ज करवाए और 42 दस्तावेज साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए।
सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने विष्णु, आदित्य उर्फ सोनू और महेंद्र को दोषी पाया।
कोर्ट ने तीनों को 10-10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाने के साथ ही पीड़िता को पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत सहायता राशि दिलाने के आदेश भी दिए।
फैसले में विशिष्ट न्यायाधीश हेमंत सिंह बघेल ने मानव तस्करी को मानवता के खिलाफ गंभीर और संगठित अपराध बताया।
अदालत ने कहा कि मानव तस्करी व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और मौलिक अधिकारों को नष्ट कर देती है। यह अपराध केवल व्यक्तिगत शोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मासूमों को जबरन श्रम, देह व्यापार और अन्य अवैध गतिविधियों में धकेला जाता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों के कारण पीड़ितों को लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है।
अदालत ने मानव तस्करी जैसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने और अपराधियों में कानून का भय पैदा करने के लिए कड़ी सजा को आवश्यक बताया।
फैसले में अदालत ने अनुसंधान अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जांच अधिकारी ने मामले में मात्र खानापूर्ति की, जिसका लाभ आरोपियों को कुछ धाराओं में मिला।
कोर्ट ने विशेष रूप से पीड़िता की उम्र से संबंधित साक्ष्यों की जांच में लापरवाही का उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार, पॉक्सो मामलों में पीड़ित की आयु से जुड़े दस्तावेज अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अनुसंधान अधिकारी ने इस पहलू पर गंभीरता से जांच नहीं की।
अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को ओडिशा भेजकर पीड़िता के स्कूल का रिकॉर्ड मंगवाया था। यह रिकॉर्ड उड़िया भाषा में था।
जांच अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि उसे उड़िया भाषा का ज्ञान नहीं था। इसके बावजूद दस्तावेजों का हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद नहीं करवाया गया।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों को समझने और उनके आधार पर आगे जांच करने का प्रयास नहीं किया गया। इस लापरवाही के कारण मामले की जांच प्रभावित हुई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मानव तस्करी और नाबालिगों के यौन शोषण जैसे गंभीर मामलों में प्रभावी अनुसंधान और ठोस साक्ष्य जुटाना बेहद आवश्यक है।
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